पंडित हनुमान प्रसाद मिश्रा जी के अवसान से स्वर्गीय अर्जुन सिंह जी के समकालीन सेवा, समर्पण, सुचिता के राजनीति पर विराम लग गया। आज के छल, प्रपंच की राजनीति में ऐसी शख्सियतें ढूंढने पर भी नहीं मिलेंगी। ऐसे विलक्षण और विरले ही व्यक्ति होते हैं, जिन्हें शतायु पूरा करने का सौभाग्य मिलता है। पंडित जी अर्जुन सिंह के विश्वासपात्र, निकटतम, सहयोगी, साथी तथा उत्थान-पतन के राजनीति के साक्षी रहे हैं। मंगलवार की शाम उनका भोपाल में दुखद निधन हो गया। पिछले वर्ष से उपचार चल रहा था। उनका पार्थिव शरीर सड़क के रास्ते से कोष्टा लाया गया जहां हजारों लोगों ने नम आंखों से अंतिम विदाई दी। उनके ज्येष्ठ पुत्र पूर्व सांसद गोविंद मिश्रा ने मुखाग्नि दी। पंडित जी का जन्म 1923 में उनके ननिहाल सुंदरी (कोष्टा) में हुआ, पंडित जी का पैतृक गांव रीवा जिला अंतर्गत मऊगंज के समीपी गांव नगई (ढ़ेरा) का है। पंडित जी के माता-पिता ससुराल वालों के बुलाने पर ढ़ेरा से कोष्टा आ गए थे। पंडित जी के पिताजी का बचपन में ही देहांत हो गया। विरासत में ननिहाल से सामान्य कृषि भूमिया मिली थी। पंडित जी बचपन से ही तीक्ष्ण बुद्धि के व्यवहार कुशल, संघर्षशील, सामाजिक व्यक्ति थे। पंडिताई भी करते थे। स्वयं के बलबूते पर कोष्टा में संपत्ति अर्जित की। पारिवारिक दायित्व निर्वहन के साथ राजनीति में भी उनकी रुचि थी। सीधी के पूर्व विधायक अधिवक्ता स्व. केशव प्रसाद सिंह से भी उनका व्यक्तिगत संपर्क था। गृह विधानसभा क्षेत्र चुरहट की राजनीति में पंडित जी स्वर्गीय जयराम प्रसाद शुक्ला तथा केशव प्रसाद के साथ अर्जुन सिंह के संपर्क में आए। राजनीतिक रसूख की बदौलत क्षेत्र के जनता की सेवा की। बहुत लोगों का काम किया, कराया। अर्जुन सिंह क्षेत्र के भ्रमण पर या सीधी जाते तो पंडित जी सहीत तिकड़ी को कार में साथ लिए रहते हैं। एक जमाने में यह तिकड़ी मशहूर थी। 1967 के विधानसभा चुनाव में चुरहट से अर्जुन सिंह तथा चंद्र प्रताप तिवारी आमने-सामने थे। चंद्र प्रताप तिवारी ने पंडित जी को लेकर एक नकारात्मक नारा गढ़ दिया-"अर्जुन सिंह के तीन दलाल, जयराम केशव और हनुमान"। यह नारा काफी लोकप्रिय हुआ। अंततः अर्जुन सिंह चुनाव हार गए।पंडित जी के व्यापक जन संपर्क का राजनीतिक लाभ उनके ज्येष्ठ पुत्र गोविंद मिश्र को मिला। पंडित जी जब राजनीति में अर्जुन सिंह के साथ थे, उसी समय नौगांव में पॉलिटेक्निक कॉलेज खुला था। गोविंद जी का कॉलेज में एडमिशन हुआ। डिप्लोमा लेकर आए और नौकरी मिल गई। पीडब्ल्यूडी में सब इंजीनियर थे। व्यक्तिगत कारणों से बाद में इस्तीफा दे दिया और राजनीति में आ गए। गोविंद मिश्रा 1977 से लेकर 1990 तक लगातार चुरहट से अर्जुन सिंह तथा राहुल भैया के खिलाफ चुनाव लड़ते रहे परंतु सफलता नहीं मिली। राहुल भैया सुंदरलाल पटवा के खिलाफ भोजपुर चुनाव लड़ने चले गए। चुरहट का खाली मैदान था। मिश्रा जी भाजपा की टिकट पर चुनाव जीत गए। राहुल भैया के चुरहट वापसी के बाद दुबारा विधानसभा चुनाव नहीं जीते। लंबे अर्से बाद सीधी लोकसभा सीट अनारक्षित होकर सामान्य हो गई।सीधी अर्जुन सिंह का गृह जिला था। अर्जुन सिंह राज्यसभा में थे। सीधी में उनकी विरासत को लेकर तकरार थी। कांग्रेस से इंद्रजीत कुमार भी दावेदार थे, क्योंकि वे विधानसभा का चुनाव हार गए थे। कांग्रेस की टिकट इंद्रजीत कुमार को मिल गई। मुकाबला भाजपा के गोविंद मिश्रा से था। पारिस्थितिजन्य मिश्रा जी चुनाव जीत कर सांसद बन गए। पंडित हनुमान प्रसाद मिश्रा ने अर्जुन सिंह के साथ मैत्री संबंधों का पालन करते हुए पुत्र गोविंद मिश्रा के पक्ष में कभी हमलावर नहीं हुए। कोई अनर्गल बयान बाजी नहीं की। बस अप्रत्यक्ष रूप से चुनाव प्रचार करते रहे। अर्जुन सिंह के जीवन काल तक पंडित जी ने सौहार्दपूर्ण संबंध रखा। अर्जुन सिंह के दुखद निधन पर शोकाकुल रहे। लगातार 13 दिनों तक शिवराजपुर आते जाते रहे। सभी कार्यक्रमों में भागीदारी निवाही। पंडित जी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि। वर्तमान पीढी को इन बुजुर्गों के मैत्रीपूर्ण संबंधों, एक दूसरे के सुख-दुख में भागीदारी, सामाजिक प्रतिबद्धता से प्रेरणा लेनी चाहिए। ( सोमेश्वर सिंह )