दवाओं के नाम पर जहर: मौत का धंधा --------------------------------------------- अंतर्राष्ट्रीय दवा बाजार में लगभग 400 से ज्यादा अनुपयोगी, अमानक तथा प्रतिबंधित दवाएं भारतीय बाजार में धड़ल्ले के साथ बिक रही हैं। जिन पर भारत सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। जन सामान्य को दवा के नाम पर मौत बांटी जा रही है। साल 2000 में फिक्स्ड ड्रग कांबिनेशन ने लगभग 1000 दवा उत्पादों को बाजार से वापस बुलाने की मांग की थी, बावजूद इसके भी वह दवाएं भारतीय बाजार में आज भी बिक रही है। भारत सरकार के ड्रग कंट्रोलर जनरल ने भी इन फिक्स ड्रग कांबिनेशन वाली दावाओं पर प्रतिबंध लगाया था। खून की कमी दूर करने के लिए बाजार में डेक्सोरेंज नाम का सिरप बेंचा जा रहा है। यह बूचड़खाने के रक्त से लिया गया हिमोग्लोबिन है। जो प्रतिबंधित है फिर भी बिक रहा है। यदि ब्लड ग्रुप मैच नहीं करता तो मानव रक्त ही एक दूसरे को नहीं दिया जा सकता। यहां तो खून की कमी दूर करने के लिए पशुओं का रक्त सिरप की शक्ल में दिया जाता है। जिन रोगियों को खांसी आती है, कफ बनता है उन्हें दो तरह का सिरप अलग-अलग दिया जाता है, सप्रेसेंट- खांसी रोकने के लिए, दूसरा एक्सपेक्टोरेंट-कफ निकालने के लिए। लेकिन दवा कंपनियां दोनों का कॉन्बिनेशन एक साथ बनाती है। जिससे ना खांसी रूकती है ना कफ निकलता है। इसी तरह का बेतुका कांबिनेशन दर्द और बुखार की दवा में किया जाता है। दर्द के लिए- एनाल्जेसिक है, बुखार के लिए- एंटीपायरेटिक्स तथा एंटी इन्फ्लेमेटरी है। किंतु तीनों दावाओं के कॉन्बिनेशन की गोलियां एक साथ दी जाती हैं। इन गोलियों को विभिन्न नाम से सनफार्मा, सिप्ला, रैनबैक्सी, कैडिला जैसी नामी कंपनियों के द्वारा अलग-अलग 1000 से भी ज्यादा अधिक ब्रांडों के नाम से बेंचा जा रहा है। कभी-कभी रोगी को बुखार के कारण अनिद्रा की बीमारी हो जाती है। नींद के लिए एल्प्राजोलम इंग्जायटी दवा अधिकतम तीन बार दी जाती है और बुखार के लिए पेरासिटामोल अधिकतम आठ बार। दोनों का कंबीनेशन एक साथ होने से दवा का कम या ज्यादा सेवन हो जाता है। इसके कई साइड इफेक्ट है। अधिकांश दवा कंपनियां मुनाफे के लिए दवा का उत्पादन करती है। जिसका उद्देश्य कम उत्पादन लागत और ज्यादा मुनाफा कमाना है। इसलिए रोगियों को ताउम्र ग्राहक बनाए रखना चाहती हैं। ऐसी दवाइयां बीमारी को खत्म करने या उसकी रोकथाम करने के बजाय सिर्फ बीमारियों के लक्षण का इलाज करती हैं। आज 90 फ़ीसदी दवा कंपनियां सिर्फ उपभोक्ताओं को वे ही दबाएं बेच रही है जिन्हें वह पूरी जिंदगी रोजाना लेते रहे। उदाहरण के लिए एक ऐसी गोली जिसकी लागत ₹100 प्रति गोली हो और वह एक ही बार में बीमारी को ठीक कर दे या होने ही न दे। दूसरा विकल्प है कि ऐसी गोली हो जिसकी लागत सिर्फ एक रुपए प्रति गोली हो और उपभोक्ता उसका सेवन जीवन भर हर दिन अर्थात साल में 365 दिन करना पड़े। दवा कंपनियों के लूट की अनेक रोचक कहानियां हैं। एनीमिया अर्थात खून की कमी के रोगियों को महंगे दर पर आयरन की 100 से ज्यादा नाम वाले वाले ब्रांड की दवाएं रिकमेंड की जाती है। फेरस फ्यूमरेट की एक कारगर गोली है। जिसके 200 एमजी टेबलेट का दाम सिर्फ 50 पैसे। इस गोली को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी रिकमेंड किया है। किंतु यह गोली किसी भी डॉक्टर के द्वारा नहीं लिखी जाती। कहने को तो भारत सरकार के अनेक संस्थान है जो दवा के उत्पादन, उनके गुणवत्ता परीक्षण, मानकों की जांच, मूल्य नियंत्रण के लिए ड्रग कंट्रोलर, ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर, मेडिकल काउंसिल इत्यादि। बावजूद इसके भी जहरीले कोल्डिफ कफ सिरप के इस्तेमाल से मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में डेढ़ दर्जन से ज्यादा नौनिहालों की असमय मौत हो जाती है। और तमाशा देखिए की सरकार कहीं का गुस्सा कहीं उतार रही है साजिशन दोषी दवा उत्पादक कंपनियों को अपरोक्ष रूप से बचने के लिए बीमार बच्चों का उपचार करने वाले डॉक्टर प्रवीण सोनी को निशाना बनाया जा रहा है। कोई भी डॉक्टर अपने ज्ञान, अनुभव और विश्वास के अनुरूप ही रोगियों का उपचार करता है। सिविल अस्पताल परसमनिया में पदस्थ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर सोनी की गलती सिर्फ इतनी है कि उन्होंने निजी क्लीनिक में बैठकर बीमार बच्चों को यह सिरप लिखा था। अमानत कोल्डिफ सिरप सेवन से मौत का यह पहला मामला नहीं है। इसके पहले भी 1990 में भारत के गुरुग्राम और दिल्ली में 33 बच्चों की तथा 2022 में गांबिया में 66 बच्चों की मौत हो चुकी है। निर्धारित मानक के अनुसार कोल्डिफ सिरप में प्रोपाइलीन ग्लाईकान नामक रसायन मिलाया जाता है जो महंगा पड़ता है। किंतु निर्माता श्री संत फार्मास्यूटिकल कंपनी ने इस रसायन की बजाय औद्योगिक रसायन डायएथिलीन का मिश्रण किया था। जो काफी सस्ता पड़ता है। सिरप में जहरीले डायएथिलीन की मात्रा 48.6 फीसदी थी। जिससे बच्चों की किडनी फेल हो गई। भारत में विभिन्न उत्पादों को लेकर उपभोक्ताओं को जागरूक करने के लिए अनेक योजनाएं चलाई जाती हैं। अभियान चलाया जाता है। दुर्भाग्य से दवाओं का इस्तेमाल करने के लिए कभी कोई जागरूकता अभियान नहीं चलाया गया। अधिकांश दवाओं के स्ट्रिप ,सीसी, लेवल में लाल रंग की पट्टी होती है। इसका मतलब होता है कि इन दवाओं का इस्तेमाल डॉक्टर के पर्ची के बिना नहीं किया जा सकता और ना ही बेचा जा सकता। फिर भी दवाई बिकती हैं। जिस दवा की पर्ची में Rx लिखा होता है इसका अर्थ है यह डॉक्टर द्वारा बताई गई दवा है। कुछ दवा की पर्चियों में NRx लिखा होता है इसका मतलब है कि इन दवाईयों की सलाह सिर्फ वही डॉक्टर दे सकता है जिन्हें इन दवाइयां को प्रिसक्राइब करने का लाइसेंस प्राप्त है और इसे वही दुकानदार दे सकता है जिसके पास इसका लाइसेंस है। कुछ दवाओं में XRx लिखा होता है ,यह दवाई सभी मेडिकल स्टोर में नहीं मिलती। यह केवल उन डॉक्टरों के पास होती है जिनके पास इसका लाइसेंस है और डॉक्टर इसे मरीज को सीधे दे सकते हैं। जिस मेडिकल स्टोर में यह दवा उपलब्ध होती है दुकानदार वह दवा उसी मरीज को देता है जिसके पास लाइसेंस हो और डॉक्टर का लिखा पर्चा हो। तमाम कानून कायदों के बावजूद भी सरकार ने आंखें मूंद रखी है। दवाओं के नाम पर मौत बेच रही फार्मास्यूटिकल कंपनियों की लूट बदसूरत जारी है। दवा के नाम पर जहर बेचने का धंधा आखिर कब तक चलेगा। सोमेश्वर सिंह वरिष्ठ पत्रकार लेखक सीधी ( म. प्र.) संपर्क: 7000231997