सीधी(सचीन्द्र मिश्र) मध्यप्रदेश के विंध्य इलाके का सीधी… जहां राजनीति सिर्फ चुनाव नहीं, परंपरा मानी जाती है। इसी धरती पर जन्मे पूर्व मंत्री इंद्रजीत कुमार को लोग आज भी “गरीबों का हमदर्द” कहकर याद करते हैं। पंच से सरपंच, सरपंच से विधायक और विधायक से मंत्री तक का सफर—वह भी सात बार विधानसभा पहुंचकर—कोई साधारण कहानी नहीं होती। वे उन दिनों राजनीति में आए जब पोस्टर कम और पैर ज्यादा चलते थे। 22 साल की उम्र में पंच बने, फिर सरपंच, फिर 1977 में विधायक और दिग्विजय सिंह की सरकार में मंत्री रहे। जूतों की माला पहनाए जाने पर भी मुस्कुराकर आशीर्वाद मान लेने वाले नेता—ऐसी सरलता अब राजनीतिक शब्दकोश में दुर्लभ प्रजाति की तरह दर्ज है। लेकिन व्यंग्य यहीं से शुरू होता है… सीधी नगर पालिका ने जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए मंत्री जी की प्रतिमा लगाने का निर्णय लिया। मूर्ति बन गई। स्थान चिन्हित हो गया। चबूतरा भी तैयार हो गया। फोटो खिंच गए। प्रस्ताव पारित हो गया। शायद शिलान्यास भी हो गया। बस… प्रतिमा नहीं लगी... वह प्रतिमा आज भी कहीं किसी के घर में पड़ी है—शायद किसी गोदाम में, शायद किसी कोने में,शायद किसी ठेकेदार के आंगन में, शायद किसी फाइल के नीचे दबे निर्णय की तरह धूल फांकती हुई.? विडंबना देखिए—नगर पालिका में आज कांग्रेस का अध्यक्ष है। वही दल, जिसके लिए इंद्रजीत कुमार ने जीवन का स्वर्णिम समय लगाया। वही पार्टी, जिसके लिए उन्होंने टिकट छोड़ा, नामांकन वापस लिया, संघर्ष किया, जीतें दिलाईं। लेकिन उनकी प्रतिमा को आज तक सार्वजनिक स्थान पर जगह नहीं मिल सकी। न जाने क्या मजबूरी है हो भी क्यों न प्रदेश में सत्ता तो दूसरों की है और जिले में भी..? सीधी की राजनीति में सवाल हवा में तैर रहा है—क्या यह सत्ता का दबाव है? क्या यह अपनों की अनदेखी है? या फिर हमारी राजनीति की वही पुरानी आदत—जीते जी उपयोग, बाद में विस्मरण..? एक समय था जब वे सात बार विधायक बनकर विधानसभा पहुंचे। आज उनकी मूर्ति एक बार भी चबूतरे तक नहीं पहुंच पा रही। राजनीति में स्मृति भी शायद वोट बैंक देखकर तय होती है। नेता बड़ा हो सकता है, लेकिन प्रतिमा की ऊंचाई सत्ता की सुविधा से नापी जाती है। सीधी की सियासत में यह कहानी सिर्फ एक मूर्ति की नहीं, स्मरण और सम्मान की है। जहां गरीबों का हमदर्द नेता आज भी किसी के घर में धूल फांक रहा है…बस चबूतरे पर खड़ा होना बाकी है।