आखिर मुख्यमंत्री सिहावल आए... पर यह आगमन विकास का नहीं, शोक का साक्षी बन गया कभी-कभी नियति की लेखनी इतनी विचित्र होती है कि मनुष्य उसके सामने निरुत्तर रह जाता है। समय के पन्नों पर जो लिखा है, उसे कोई शक्ति मिटा नहीं सकती। सिहावल की धरती पर यह बात एक बार फिर सत्य साबित हुई, जब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव आखिरकार यहाँ पहुँचे — मगर उस रूप में नहीं, जिसकी जनता प्रतीक्षा कर रही थी। मुख्यमंत्री का यह आगमन किसी उद्घाटन, शिलान्यास या जनसभा के लिए नहीं था; बल्कि यह एक शोक यात्रा का मौन पड़ाव था। वह सिहावल विधायक विश्वामित्र पाठक के निवास पहुँचे — जहाँ वातावरण में पीड़ा थी, शब्दों में सन्नाटा और आंखों में नमी। मुख्यमंत्री ने विधायक की धर्मपत्नी श्रीमती हीरा बाई पाठक के निधन पर अपनी गहरी श्रद्धांजलि अर्पित की और परिवार को सांत्वना दी। यह वही सिहावल है, जहाँ कुछ सप्ताह पहले ही मुख्यमंत्री के कार्यक्रम की तैयारियाँ पूरे उत्साह से चल रही थीं। विधानसभा क्षेत्र के बहरी में उनका आगमन प्रस्तावित था — मंच सज चुके थे, स्वागत द्वार बन चुके थे, जनता के बीच उम्मीदों का सागर उमड़ रहा था। परंतु किसे पता था कि उसी उत्सव की पूर्व संध्या पर एक भीषण सड़क दुर्घटना सबकुछ बदल देगी। उस दुर्घटना में कई मासूम जानें चली गईं, और पूरा क्षेत्र शोक में डूब गया। मुख्यमंत्री का आगमन उसी क्षण टल गया — और जनता के मन में रह गई एक अधूरी प्रतीक्षा। कहा गया था कि मुख्यमंत्री शोकाकुल परिवारों से मिलने आएंगे, लेकिन वह यात्रा भी संभव नहीं हो सकी। और फिर—जैसे समय ने स्वयं एक चक्र पूरा किया हो—एक महीने बाद मुख्यमंत्री सिहावल पहुंचे, पर इस बार मंच पर भाषण नहीं, बल्कि मौन श्रद्धांजलि थी। यह वही भूमि है, जो विंध्य की संस्कृति, संघर्ष और संवेदना का प्रतीक रही है। पर नियति का खेल देखिए—जब विकास का उत्सव होना था, तब दुख का सन्नाटा छा गया। मुख्यमंत्री आए, पर रिबन काटने नहीं; दीप जलाने नहीं — बल्कि श्रद्धांजलि स्वरूप एक दीप बुझने पर उसकी स्मृति में नमन करने। कभी-कभी यह संसार हमें सिखाता है कि शक्ति और पद भी शोक के आगे मौन हो जाते हैं। सिहावल की गलियों ने इस बार जयघोष नहीं सुना, बल्कि संवेदना की गूंज महसूस की। डॉ. मोहन यादव का यह आगमन बताता है कि राजनीति से ऊपर भी एक मानवीय धरातल होता है — जहाँ न सत्ता बोलती है, न भाषण — केवल भावनाएँ बोलती हैं। नियति के इस प्रसंग ने यह भी जता दिया कि जो मुलाकात पहले टल गई थी, वह आज नियति की रेखाओं में पूरी हुई। फर्क बस इतना था — तब उत्सव की प्रतीक्षा थी, अब श्रद्धा और शून्यता का संगम था।