सीधी (सचीन्द्र मिश्र)- जिले में इस बार गेहूं उपार्जन ऐसा हुआ कि किसान तो खुश रहे होंगे, लेकिन गेहूं शायद अपने भाग्य को कोस रहा होगा। प्रशासन ने दावा किया था कि खरीदी केन्द्रों पर ऐसी चाक-चौबंद व्यवस्था है कि अगर बादल भी बरसने आएंगे तो पहले अनुमति लेकर आएंगे। संसाधन इतने पुख्ता बताए गए कि लगता था गेहूं नहीं, किसी वीआईपी मेहमान की सुरक्षा की जा रही है। कलेक्टर साहब खुद मैदान में उतरे। खरीदी केन्द्रों का निरीक्षण किया। अधिकारियों को फटकार लगाई। यहां तक कि अपने हाथों से तिरपाल भी चढ़ाई। तस्वीरें खिंचीं, खबरें छपीं और जनता ने सोचा कि अब गेहूं सुरक्षित है। लेकिन शायद बादलों ने अखबार नहीं पढ़ा था। बरसात आई और सीधे गेहूं से मिलने पहुंच गई। तिरपाल बेचारा सरकारी फाइल की तरह किनारे पड़ा रहा और पानी अपना काम करता रहा। नतीजा यह हुआ कि कई केन्द्रों पर गेहूं अंकुरित होने की तैयारी में लग गया और कुछ जगहों पर ऐसी सुगंध फैलने लगी कि लोगों को लगने लगा कहीं खाद बनाने की यूनिट तो नहीं खुल गई। कमर्जी खरीदी केन्द्र की हालत तो और भी दिलचस्प है। वहां करीब 100 क्विंटल गेहूं सड़ गया। अब सामान्य सोच कहती है कि खराब अनाज अलग कर दिया जाए, लेकिन सरकारी सोच सामान्य थोड़ी होती है। इसलिए सड़े हुए गेहूं को भी बड़े प्यार से बोरों में भरवाया जा रहा है, मानो उसकी विदाई किसी सम्मान समारोह की तरह हो रही हो। कहने वाले तो यह भी कह रहे हैं कि गेहूं इतना "परिपक्व" हो गया है कि अब उसमें खुशबू नहीं, सीधे "सुगंधित चेतावनी" निकल रही है। लेकिन जिम्मेदारों को शायद यह खुशबू विकास की महक लग रही है। सबसे मजेदार बात यह है कि जब गेहूं भीग रहा था, तब जिम्मेदारों की जवाबदेही भी शायद किसी तिरपाल के नीचे आराम कर रही थी। बारिश थमी, गेहूं सड़ा, बदबू फैली, लेकिन कागजों में सब कुछ "सुरक्षित भंडारित" ही रहा। अब जनता भी सोच रही है कि अगर कलेक्टर साहब के हाथों चढ़ी तिरपाल और प्रशासन की चौकसी मिलकर गेहूं को नहीं बचा पाई, तो फिर गेहूं को अगली बार जीवन बीमा ही करवा लेना चाहिए। कुल मिलाकर इस खरीदी सीजन का निष्कर्ष यही है कि "गेहूं पानी में डूब गया, जिम्मेदारी फाइलों में सूख गई और तिरपाल सरकारी दावों की तरह हवा में उड़ती रह गई!"