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MP में प्राइमरी स्तर पर ड्रॉपआउट शून्य के करीब, लेकिन आगे की पढ़ाई में बड़ी गिरावट

नीति आयोग रिपोर्ट में शिक्षा व्यवस्था की उपलब्धियां और चुनौतियां दोनों उजागर

भोपाल(ईन्यूज एमपी)- मध्य प्रदेश में स्कूली शिक्षा को लेकर नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट में मिश्रित तस्वीर सामने आई है। जहां एक ओर प्राइमरी स्तर पर ड्रॉपआउट रेट में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है, वहीं माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्तर पर स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।

रिपोर्ट के अनुसार पिछले एक दशक में प्राइमरी स्कूलों में ड्रॉपआउट रेट 10.14 प्रतिशत से घटकर लगभग शून्य पर पहुंच गया है, जो शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।

9वीं-10वीं में बढ़ रही पढ़ाई छोड़ने की प्रवृत्ति

हालांकि कक्षा 9वीं और 10वीं में हर 100 में से करीब 17 छात्र पढ़ाई बीच में ही छोड़ रहे हैं। इसके अलावा लगभग 31 प्रतिशत छात्र 11वीं कक्षा तक पहुंच ही नहीं पा रहे हैं। प्रदेश में 10वीं से 11वीं के बीच ट्रांजिशन रेट 68.9 प्रतिशत दर्ज किया गया है, जो सुधार की जरूरत को दर्शाता है।

बुनियादी ढांचे की कमी भी बड़ी चुनौती

रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रदेश के 463 स्कूल ऐसे हैं, जहां एक भी छात्र नामांकित नहीं है। वहीं 52 हजार से अधिक शिक्षकों के पद रिक्त हैं, जिनमें लगभग 90 प्रतिशत पद प्राइमरी स्कूलों के हैं।

डिजिटल सुविधाओं की स्थिति भी संतोषजनक नहीं है। केवल 45.7 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है, जबकि महज 19.6 प्रतिशत स्कूलों में स्मार्ट क्लास संचालित हो रहे हैं।

शिक्षकों की गुणवत्ता पर भी सवाल

रिपोर्ट में शिक्षकों की गुणवत्ता को लेकर भी चिंता जताई गई है। ‘साथ-ई’ प्रोजेक्ट के तहत किए गए आकलन में कई शिक्षक अपने ही विषय में 60-70 प्रतिशत अंक भी हासिल नहीं कर सके।

इसके अलावा शिक्षकों का लगभग 14 प्रतिशत समय चुनाव ड्यूटी, सर्वे और मिड-डे मील जैसी गैर-शैक्षणिक गतिविधियों में व्यतीत हो रहा है, जिससे पढ़ाई प्रभावित होती है।

अन्य राज्यों के साथ तुलना

रिपोर्ट में मध्यप्रदेश के साथ झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में भी शिक्षा की समान चुनौतियों का उल्लेख किया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्राइमरी स्तर पर सुधार के बाद अब सरकार को माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट रोकने, शिक्षकों की गुणवत्ता सुधारने और बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने पर विशेष ध्यान देना होगा।

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