भोपाल(ईन्यूज एमपी)- मध्यप्रदेश में बिजली उपभोक्ताओं पर लगातार बढ़ते बिल का बोझ एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। हाल ही में बिजली दरों में वृद्धि के फैसले के बाद प्रदेश के करीब 1.90 करोड़ उपभोक्ताओं की जेब पर असर पड़ने वाला है। बिजली वितरण कंपनियों द्वारा घाटा दिखाकर हर साल टैरिफ बढ़ाने की प्रक्रिया जारी है। इस बार कंपनियों ने लगभग 6044 करोड़ रुपए के घाटे का हवाला देते हुए करीब 10 प्रतिशत से अधिक वृद्धि का प्रस्ताव दिया था, हालांकि नियामक आयोग ने इसमें से 4.80 प्रतिशत बढ़ोतरी को मंजूरी दी है। यह नई दरें अप्रैल से लागू होंगी, जिससे उपभोक्ताओं के मासिक खर्च में इजाफा होगा। जानकारी के अनुसार, 200 यूनिट बिजली खपत करने वाले उपभोक्ताओं को हर महीने लगभग 80 रुपए अधिक भुगतान करना पड़ेगा, जबकि अधिक खपत करने वालों पर इसका असर और ज्यादा होगा। विशेषज्ञों का कहना है कि बिजली कंपनियों के घाटे के दावों की प्रभावी जांच का अभाव है। वितरण व्यवस्था में तकनीकी और लाइन लॉस अब भी 16 से 21 प्रतिशत तक बना हुआ है, जबकि इसे कम करने के लिए सरकार द्वारा वर्षों से हजारों करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। इसके बावजूद नुकसान कम नहीं हो रहा और इसका बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर डाला जा रहा है। इसके अलावा यह भी सामने आया है कि प्रदेश में जरूरत से ज्यादा बिजली खरीद के अनुबंध किए गए हैं, जिनमें कई बार बिजली खरीदी ही नहीं जाती, फिर भी भुगतान करना पड़ता है। पावर मैनेजमेंट और वितरण व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी और ऑडिट की व्यवस्था कमजोर होने के कारण भी सवाल उठ रहे हैं। राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे को लेकर विरोध बढ़ गया है। विपक्ष का आरोप है कि पिछले 10 वर्षों में प्रदेश में बिजली दरों में करीब 22 से 24 प्रतिशत तक वृद्धि हो चुकी है, जिससे आम उपभोक्ता, किसान और मध्यम वर्ग पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ा है। बढ़ती बिजली दरों और लगातार हो रही वृद्धि को लेकर अब जांच की मांग तेज हो गई है। उपभोक्ताओं का कहना है कि कंपनियों के प्रबंधन और घाटे की वास्तविक स्थिति स्पष्ट किए बिना हर साल दरें बढ़ाना न्यायसंगत नहीं है। [