सीधी(ईन्यूज एमपी)- इस शहर में एक सेठ जी हैं काम से इतने चर्चित कि जहां विवाद हो, वहां इनकी परछाईं पहले पहुंच जाती है। मुद्दा कोई भी हो —सेठ जी हर बार ... चादर ओढ़कर मंच पर खड़े मिल जाते हैं। और मजे की बात यह कि हर आंदोलन, हर मांग, हर विरोध के बीच उनकी अपनी दुकान भी चुपचाप चमक जाती है। इस बार सेठ जी का दिल शहर की सुंदरता पर आया। बोले—फ्लैक्स गंदगी हैं, फ्रेम अतिक्रमण हैं, सड़क किनारे विज्ञापन शहर की शान बिगाड़ रहे हैं। फिर क्या था, नगरपालिका पर “समाजसेवी दबाव” पड़ा और लोकल वेंडरों के फ्लैक्स बिना नोटिस ऐसे हटे जैसे बारिश में कागज की नाव। किराया जमा है या नहीं, नियम हैं या नहीं—इन सवालों का जवाब किसी फाइल में नहीं, सेठ जी की पहुंच में था। इधर, दूसरी तरफ, नियमों को बायपास कर यूनिपोल खड़े होने लगे। सड़क से चिपके, ऊंचाई कम, भीड़भाड़ वाले चौराहों पर तनकर खड़े यूनिपोल मानो कह रहे हों—हम नियम से नहीं, साठगांठ से लगे हैं। ठेकेदार बाहर का, अनुभव प्रमाण पत्र फर्जी, लेकिन सेठ जी की सिफारिश असली। टेंडर की टाइमलाइन भी सेठ जी की घड़ी से चली—नवंबर में खुला, मई में सूचना, किराया अब तक बकाया, मगर कौन पूछे? आखिर सेठ जी हैं। लोगों ने सवाल उठाए। लोकल वेंडरों ने कहा—भाई, अगर नियम हैं तो सब पर लागू हों। लेकिन सेठ जी को भरोसा था—नगरपालिका हमारी है, प्रशासन हमारा है, शहर हमारा है। उन्हें लगा था कि यह खेल हमेशा की तरह चुपचाप निकल जाएगा। मगर इस बार कहानी में टेस्ट आ गया जिले के मुखिया ने साफ कह दिया—सेठ जी, यहां तेरी नहीं, मेरी चलेगी। समाजसेवा की आड़ में बनियागिरी नहीं चलेगी। साम्राज्य समझने की भूल मत करो...? और तभी एसडीएम का आदेश आ गया—धारा 152, अवैध होर्डिंग हटाओ, खुद हटाओ वरना प्रशासन हटाएगा। अब वही यूनिपोल, जो कल तक रुतबे की तरह खड़े थे, आज नोटिस की छाया में हैं। वही सेठ जी, जो हर मुद्दे की मलाई खाते थे, अब नियमों की कड़वी गोली निगलने को मजबूर हैं। शहर समझ गया है कि समाजसेवा और सौदेबाजी में फर्क होता है। और प्रशासन ने भी बता दिया—यह सीधी है, सीधी बात होगी। अब देखना यह है कि सेठ जी अगला आंदोलन किस मुद्दे पर लाते हैं। लेकिन एक बात तय है—इस बार आड़ में ठेकेदारी नहीं चलेगी।