सीधी(ईन्यूज एमपी)- 0 से 6 वर्ष तक के बच्चों के समग्र विकास के लिए आंगनवाड़ी केन्द्र संचालित किए जा रहे हैं—कागज़ों पर तो यही लिखा है। उद्देश्य है कि बच्चे शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक रूप से विकसित हों। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि जहां बच्चों के हाथ में पौष्टिक भोजन की थाली होनी चाहिए, वहां खाली कटोरी और सूखी रोटी ही ‘समग्र विकास’ का प्रतीक बन गई है। इनके हिस्से का पोषण जिम्मेदार और विभागीय चूहे हज़म कर रहे हैं? बाल विकास विभाग ने बड़ी गंभीरता से बच्चों के लिए साप्ताहिक पौष्टिक भोजन सूची जारी की है— जिसमें सोमवार को भुजिया, मंगलवार को पोहा, बुधवार को खिचड़ी, गुरुवार को उपमा, शुक्रवार को दलिया और शनिवार को इडली-लड्डू। कागज़ों में तो यह मेन्यू पांच सितारा होटल जैसा लगता है, लेकिन असलियत में बच्चे इस ‘पोषण योजना’ की सुगंध तक से अनजान हैं। उन्हें तो केवल दोपहर में सब्जी रोटी या दाल चावल ही नसीब हो रहा है बाकी की मलाई तो कोई और ही खा रहा है। जिसका कारण चूल्हा चलाने वाले और उनको संरक्षण देने वाले दोनों ही है। जी हां कहने को तो सीधी शहर में 59 आंगनवाड़ियां संचालित हैं, जिनमें करीब 2200 बच्चे पंजीकृत हैं। इनके भोजन के लिए हर माह महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा करीब साढ़े तीन लाख रुपये जारी किए जाते हैं। लेकिन न तो नाश्ता दिखता है, न भोजन की खुशबू। बच्चों का हिस्सा रास्ते में ही किसी और के पेट में पहुंच जाता है — कोई समूह के नाम पर, तो कोई जिम्मेदारी के नाम पर ‘भोजन’ हजम कर जाता है। कहने को तो भोजन व्यवस्था की जिम्मेदारी 6 अलग-अलग स्व-सहायता समूहों को सौंपी गई है, लेकिन हकीकत में मैदान में दो-तीन ‘धुरंधर खिलाड़ी’ ही पूरा मैच खेल रहे हैं। विभाग एम्पायर की भूमिका में खड़ा है — आंखों पर गांधी जी वाला चश्मा लगाए हुए, और शायद वही चश्मा अब सब कुछ ‘धुंधला’ दिखाने लगा है। बच्चे भूखे हैं, पर कागज़ों में वे तृप्त हैं। विभाग खुश है, क्योंकि रिपोर्टें रंगीन हैं। आंकड़ों में पोषण बढ़ रहा है, पर असल में कुपोषण ‘विजेता’ बना बैठा है। सीधी की आंगनवाड़ियों में आज पोषण नहीं, भ्रष्टाचार ही असली आहारबन गया है। और जिम्मेदार केवल कागजों को रंगीन करने में लगे हैं अधिकारी ही नहीं आम आदमी भी अगर जाकर किसी आंगनबाड़ी केंद्र को देख ले और बच्चों से पूछ ले की खाने में क्या मिलता है तो इस पोषण तंत्र की हकीकत सामने आ जाएगी। महिला वाल विकास विभाग भले ही इस भ्रष्ट तंत्र का सहभागी हो लेकिन सीधी के कलेक्टर की छवि आमजनों में वेहतर है और इन 2200 बच्चों की बेहतरी के लिये उन्हीं से दरकार है ...