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Home सीधी दर्पण जब सचिव बने व्यापारी, जीआरएस बने फर्म – कुसमी की पंचायतों में भ्रष्टाचार का नया ‘स्टार्टअप मॉडल’!

जब सचिव बने व्यापारी, जीआरएस बने फर्म – कुसमी की पंचायतों में भ्रष्टाचार का नया ‘स्टार्टअप मॉडल’!

जब सचिव बने व्यापारी, जीआरएस बने फर्म – कुसमी की पंचायतों में भ्रष्टाचार का नया ‘स्टार्टअप मॉडल’!



सीधी(ईन्यूज एमपी)-कुसमी जनपद की कई पंचायतों में विकास कार्यों के नाम पर गड़बड़ियों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। अब तो भ्रष्टाचार ने यहाँ एक नया रूप ले लिया है — जैसे सरकारी सिस्टम नहीं, बल्कि “स्टार्टअप मॉडल” चल रहा हो। फर्क सिर्फ इतना है कि निवेश शासन का है और मुनाफा अधिकारियों-सचिवों का।

वस्तुआ पंचायत का ताज़ा मामला

नवीन मामला ग्राम पंचायत वस्तुआ का है, जहाँ पंचायत सचिव ने नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए अपने ही ग्राम रोजगार सहायक (जीआरएस) को “फर्म” बना दिया। जी हाँ, जिनका काम पंचायत में तकनीकी सहयोग देना था, वही अब ‘व्यापारी’ घोषित हो गए। सूत्रों के मुताबिक, सचिव ने ₹15,000 की राशि सीधे उसी जीआरएस के खाते में डाल दी — और पंचायत रजिस्टर में इसे “सामग्री क्रय भुगतान” दिखाया गया।

अब ग्रामीणों में यह सवाल उठ रहा है कि सचिव ने यह रिश्ता “सरकारी सेवा” का बनाया था या “बिज़नेस पार्टनरशिप” का?

नियमों की खुली अनदेखी

पंचायत नियमों के अनुसार, भुगतान केवल पंजीकृत विक्रेता या फर्म के माध्यम से ही किया जा सकता है। परंतु यहां सचिव ने यह तर्क दिया कि “जब अपना आदमी है तो ट्रांसपेरेंसी की गारंटी भी पक्की है!” — इस ‘क्रिएटिव तर्क’ ने ग्रामीणों को हैरान कर दिया।

इतना ही नहीं, इस पूरी लेन-देन प्रक्रिया में एक और चौंकाने वाली बात सामने आई। पंचायत के सभी 9 वेण्डरों के बिलों का क्रमांक एक ही — “15” पाया गया। अब ग्रामीण इसे “दिव्य संयोग” कहें या सचिव का “कैल्क्युलेटेड कॉइनसिडेंस”, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा।

लाखों रुपये का भुगतान, एक ही क्रमांक पर

उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, पंचायत सचिव द्वारा निम्नानुसार भुगतान किए गए —

* जीआरएस संतोष पाठक को ₹15,000
* नवीन तिवारी को ₹32,560
* बंटी मोबाइल गिफ्ट स्पोर्ट्स को ₹20,000
* अर्पिता ट्रेडर्स को ₹1,00,000
* गांधी इंटरप्राइजेज को ₹46,730
इन सबको मिलाकर कुल ₹2,60,970 का भुगतान किया गया है।

ग्रामीणों का कहना है — “इतने सारे बिल एक ही नंबर से कैसे निकल आए सचिव जी? क्या प्रिंटर में भी आपकी हिस्सेदारी है?”

पंचायतों में जांच सिर्फ औपचारिकता बन गई

कुसमी क्षेत्र की कई पंचायतों में हाल के महीनों में इस तरह के लेन-देन के मामले सामने आए हैं, लेकिन हर बार मामला सिर्फ “जांच की जाएगी” तक सीमित रह जाता है। शिकायत होती है, नोटिस निकलता है, फिर धीरे-धीरे मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि “अब तो फाइलों से ज़्यादा पैसे घूमते हैं और जवाबदेही सिर्फ कागज़ों तक सीमित है।”

जनता के हक़ का पैसा बना निजी कारोबार

ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत के विकास कार्यों के नाम पर सरकारी धन को निजी लाभ के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। पारदर्शिता का नाम लेकर सचिव, सहायक और फर्मों का ऐसा गठजोड़ तैयार हो चुका है, जो सरकारी सिस्टम से ज़्यादा “प्राइवेट लिमिटेड” की तरह काम कर रहा है।

व्यंग्य में दर्द — “यहां सचिव ही सरकार है”

कुसमी के एक ग्रामीण ने कहा —
“यहां सचिव ही सरकार है, बिल ही बयान हैं और जांच तो बस एक रस्म है!”

कुसमी की यह कहानी सिर्फ एक पंचायत की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की हकीकत है जहां विकास की आड़ में “विकास पुरुषों” की एक नई नस्ल पैदा हो गई है — जो न ठेकेदार हैं, न व्यापारी, पर दोनों के बीच की वही महीन रेखा हैं जिसे जनता “भ्रष्टाचार” कहती है।

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