सीधी(ईन्यूज एमपी)- जिस जमीन के नक्शे में सुधार कराने के लिए एक महिला 21 साल से सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही हो, उस महिला की पीड़ा का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। हर बार न्याय की उम्मीद लेकर राजस्व अधिकारियों के दरवाजे पहुंचना, आदेश जारी होने के बाद भी कार्रवाई का इंतजार करना और अपनी ही जमीन के विवाद को सुलझाने के लिए वर्षों तक संघर्ष करना—सुनीता गुप्ता की कहानी प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। सुनीता गुप्ता का आरोप है कि राजस्व विभाग जमीन के नक्शे में आवश्यक बदलाव नहीं कर रहा है। इसी वजह से जमीन का विवाद आज तक नहीं सुलझ पाया। उनका कहना है कि वर्षों से न्याय की गुहार लगाने के बावजूद उनकी समस्या का समाधान नहीं हुआ। अब सवाल यह है कि जब एक महिला की शिकायत पर जांच हो चुकी थी और तत्कालीन कलेक्टर ने कार्रवाई के निर्देश दिए थे, तो उन निर्देशों पर अमल क्यों नहीं हुआ? सुनीता गुप्ता के मुताबिक, वर्ष 2021 में राममिलन साहू ने उनकी जमीन के बगल की जमीन खरीदी और इसके बाद कब्जा कर लिया। महिला का आरोप है कि नक्शे में सुधार नहीं होने के कारण विवाद लगातार बना हुआ है। उनके पति बाबूलाल गुप्ता का दावा है कि राममिलन साहू प्रभावशाली व्यक्ति हैं और इसी कारण उन्हें न्याय मिलने में परेशानी हो रही है। विवादित जमीन की कीमत तीन करोड़ रुपये से अधिक बताई जा रही है। हालांकि, जमीन पर कब्जे और विवाद से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। इसके बावजूद यह मामला राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली और आम नागरिकों को समय पर न्याय मिलने की व्यवस्था पर सवाल जरूर उठाता है। मामले में सबसे गंभीर पहलू यह है कि तत्कालीन कलेक्टर स्वरोचिष सोमवंशी ने 22 सितंबर 2025 को जांच के बाद पटवारी विनोद पटेल और राजस्व निरीक्षक दिलीप दीपांकर को दोषी पाया था। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, बिना आवेदन के सीमांकन की प्रक्रिया को नियमों के विरुद्ध माना गया और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के आदेश दिए गए थे। सुनीता गुप्ता का आरोप है कि तत्कालीन तहसीलदार राकेश शुक्ला और एसडीएम प्रिया पाठक ने इन आदेशों पर कार्रवाई नहीं की। यदि जांच के बाद आदेश जारी हुए थे, तो उनका पालन क्यों नहीं हुआ? क्या आदेशों को संबंधित स्तर पर लंबित रखा गया या फिर मामले में आगे कोई कार्रवाई ही नहीं की गई? इन सवालों का जवाब अब भी सामने आना बाकी है। महिला की शिकायत और पुराने आदेशों को लेकर जब वर्तमान कलेक्टर विकास मिश्रा से बात की गई, तो उन्होंने कहा कि उन्हें अब तक इस आदेश की जानकारी नहीं थी। उन्होंने आश्वासन दिया कि अब मामला सामने आने के बाद एसडीएम के माध्यम से पूरे प्रकरण की जांच कराई जाएगी। यदि पूर्व में कलेक्टर द्वारा कोई आदेश जारी किए गए हैं, तो नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। वहीं, एसडीएम प्रिया पाठक ने मामले की जानकारी होने से इनकार किया है। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस प्रकरण में पहले ही जांच और कार्रवाई के आदेश की बात सामने आ रही है, वह अब तक जिम्मेदार अधिकारियों के संज्ञान में क्यों नहीं पहुंचा? सुनीता गुप्ता के लिए यह केवल जमीन के नक्शे में सुधार का मामला नहीं है। यह वर्षों से लंबित उस उम्मीद की लड़ाई है, जिसमें वह चाहती हैं कि उनकी शिकायत सुनी जाए, दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच हो और नियमों के अनुसार विवाद का समाधान किया जाए। एक आम महिला के लिए 21 साल तक राजस्व कार्यालयों के चक्कर काटना आसान नहीं है। ऐसे में यदि जांच के बाद आदेश जारी होने के बावजूद कार्रवाई नहीं होती, तो प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है। अब निगाहें कलेक्टर विकास मिश्रा के निर्देश पर होने वाली जांच और संभावित कार्रवाई पर टिकी हैं। क्या सुनीता गुप्ता को इस बार न्याय मिलेगा? क्या पुराने आदेशों की वास्तविक स्थिति सामने आएगी? और क्या जिम्मेदार पाए जाने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी? सुनीता गुप्ता को अब आश्वासन नहीं, न्यायपूर्ण कार्रवाई का इंतजार है। 21 साल का संघर्ष यही सवाल पूछ रहा है—आखिर एक महिला को अपनी जमीन के विवाद का समाधान पाने के लिए और कितने साल इंतजार करना पड़ेगा?